
अभ्यास एवं वैराग्य द्वारा चित्त वृत्तियों के निरोध के लिए अष्टांगयोग को क्रमशः अभ्यास एवं प्रयत्न करना चाहिए।
यथा- यमनियमासन प्राणायाम प्रत्याहार धारणा ध्यान समाधयोष्टावङ्गानि।। (2/29)
- यम
- नियम
- आसन
- प्राणायाम
- प्रत्याहार
- धारणा
- ध्यान
- समाधि
- यम – अष्टांग योग के अनुसार यम पांच प्रकार के होते है। 1.अहिंसा 2.सत्य 3.अस्तेय 4. ब्रह्मचर्य 5. अपरिग्रह
अहिंसा– शरीर, वाणी, मन से काम, क्रोध, लोभ, मोह मायादि द्वारा किसी भी प्राणी के मनसा-वाचा-कर्मणा पीडा हानि नही पहुचाना इसे अहिंसा कहते है।
सत्य– हमेशा अपरिवर्तनशील, यथार्थ ज्ञान ही सत्य है जैसा देखा, सुना, पढा एवं सीखा वैसा ही मन एवं वाणी में रखना।
अस्तेय— स्तेय-चोरी करना, अस्तेय-चोरी नही करना। दूसरों के पदार्थों को बिना अनुमति के नही लेना, वाणी एवं मन से भी लेने की इच्छा नही रखना अस्तेय है।
ब्रह्मचर्य– मन, वचन एवं शरीर से गुप्त इन्द्रियां (जननेन्द्रि) पर संयम रखना ब्रह्मचर्य कहलाता है। वीर्यनाश नही करना, जितेन्द्रिय रहना उपस्थेन्द्रिय के संयम का नाम ब्रह्मचर्य है।
अपरिग्रह– धन, सम्पत्ति, भोग सामग्री आदि का आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु इनका अनावश्यक संचय नही करना। न्यूनतम आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का घर में इकठ्ठा नही करना।
2. नियम– पांच नियम अष्टांग योग के अनुसारः-
- शौच
- संतोष
- तप
- स्वाध्याय
- ईश्वर प्रणिधान
शौच– शरीर को अन्दर एवं बाहर से शुद्ध एवं पवित्र रखना, तन एवं मन की शुद्धि।
संतोष– स्वयोग्तानुसार प्राप्त सम्पत्ति में प्रसन्न रहना। अनावश्यक तृष्णा को छोड देना संतोष है।
तप– तन एवं मन से की जाने वाली साधना तप है। सुख-दुःख, भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी, मान-अपमान आदि द्वंदों को शान्ति एवं धैर्यपूर्वक सहन करना। शरीर प्राण इन्द्रियों और मन के उचित अभ्यास को तप कहते है।
स्वाध्याय– वेद, उपनिषद, सांख्य, योग और अध्यात्म सम्बंधी ज्ञान के स्त्रोतों, साहित्यों, शास्त्रों का अध्ययन करना। प्रणव एवं गायत्री मंत्र का जप करना।
ईश्वर प्रणिधान– मनसा, वाचा, कर्मणा सभी कर्मों को एवं उनके फलों को ईश्वर को प्रति समर्पित करना।
उक्त पांच नियमों में से तप-स्वाध्याय एवं ईश्वर प्रणिधान इन तीनों को संयुक्त रूप से क्रियायोग कहते है।
3. आसन– स्थिरसुखमासनम् (योग सूत्र 2/46)

- दीर्घकालीन स्थिरता हो
- सुखानुभूति (आरामदायक) हो
आसन सिद्धिः– प्रयत्नशैथिल्यानन्तसमापत्तिक्ष्याम् ।।
प्रारम्भ में आसन करने पर मांसपेशियों में पीडा होती है किन्तु लगातार अभ्यास करने से पीडा नही होती अपितु स्थिर एवं सुख की प्राप्ति होती है। प्रयत्न शैथिल्य एवं अनन्त समापत्ति ये दोनों आसन सिद्धि के लक्षण है।
आसनों के प्रकारः- बैठकर, खडे होकर, पीठ के बल, पेट के बल, मरोडकर पांच प्रकार के आसन होते है।
- जिसमें शारीरिक अभ्यास की स्थिति स्थिर एवं सुखदायी हो वह आसन है।
- बिना चेष्टा के अधिक समय तक बैठना वह आसन है।
- चेष्टाओं को त्यागकर, परमात्मा में मन लगाना ही आसन सिद्धि है।
- आसन सिद्धि पश्चात सर्दी-गर्मी आदि द्वन्दों का प्रभाव नही होता है।
- संधियों, ग्रंथियों एवं नाडियों पर सुप्रभाव पडता है।
- आसनों के सतत नियमित अभ्यास से शारीरिक स्वास्थ्य एवं मानसिक शान्ति की प्राप्ति होती है।
4. प्राणायाम– तस्मिन्सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः।
आसन से स्थिर होने पर श्वास-प्रश्वास की गति को रोकना ही प्रणायाम है।
दीर्घ-सूक्ष्म- श्वास की सामान्य गति को दीर्घ एवं सूक्ष्म करना प्राणायाम है।
प्राणयाम के चार प्रकारः-
- बाह्य वृत्ति – रेचक
- आन्तर वृत्ति – पूरक
- स्तम्भ वृत्ति – कुम्भक
- बाह्याभ्यन्तर विषमापेक्षी (पूरक एवं कुम्भक)
- बाह्य विषय- नासिका एवं भ्रूमध्य
- आभ्यन्तर विषय- हृदय एवं षट्चक्र
त्रिविध श्वासक्रिया–
- पूरक – श्वास लेना
- रेचक – श्वास छोडना
- कुम्भक – श्वास रोकना
- आभ्यान्तर कुम्भक- श्वास अन्दर लेकर अन्दर ही रोकना
- बाह्य कुम्भक – श्वास बाहर निकालकर बाहर ही रोकना।
श्वासगति क्रम प्राणायाम – पूरक-1 कुम्भक-4 रेचक अभ्यास-2
त्रिबंध– 1- मूलबंध – मूलाधार के स्नायुओं को सिकोडकर ऊपर का ओर खींच लेना
2- जालन्धर बंध – ठुड्डी कंठ कूप में लगाकर रखना।
3- उड्डियान बंध – पेट का मांसपेशियों को अधिकाधिक ऊपर एवं अन्दर की ओर दबाकर रोकना।
प्राणायाम का महत्व– 1. नस नाडियां पुष्ट होती है।
2. बुद्धि तेज एवं आयु में वृद्धि होती है।
3. क्रोध, द्वेष आदि भावनाओं पर नियंत्रण होता है।
5. प्रत्याहार– स्वविषयासम्प्रयोगे चित्तस्य स्वरूपानुकारैवेन्द्रियांणां प्रत्याहारः ।। (पतंजलि योग दर्शन 2/54)
अर्थात इन्द्रियों को अपने विषयों से हटाकर चित्त के स्वरूप का अनुकरण करना प्रत्याहार कहलाता है।
- विषयों से विमुख होना ही प्रत्याहार है।
- इन्द्रियों के विषयों रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, शब्द, काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार से हटाकर अन्तर्मुखी होना।
- इन्द्रियों का वशीकरण करना ही प्रत्योत्तर है।
- प्रत्याहार सिद्ध होने पर इन्द्रियों पर पूर्ण अधिकार हो जाता है।
6. धारणा– देशबंधश्चित्तस्य धारणा (पतंजलि योग दर्शन 3/1)
चित्त को बाह्य या आभ्यान्तर देश में समाहित करना।
- चित्त को शरीर के बाहर या भीतर बोधे रखना।
- बाह्य धारणा में चित्त को ऊं, सूर्य, चन्द्रमा, मूर्ति बाह्य वस्तु पर ठहराना।
- आभ्यान्तर धारणों में- चित्त मूलाधार नाभि प्रदेश, हृदय प्रदेश, ब्रह्म रन्ध्र पर ठहराना।
- धारणा अभ्यास की चार मुद्रायें-
- अगोचरी मुद्रा
- भूचरी मुद्रा
- चाचरी मुद्रा
- शाम्भवी मुद्रा- ध्यान के आसन में बैठकर दृष्टि को दोनों भौं के मध्य स्थिर करना।
- धारणा ध्यान की पूर्व अवस्था है।
- धारणा हेतु मन को चक्रों पर स्थिर करने का सतत अभ्यास करना होता है।
- धारणा मानसिक एकाग्रता का अचूक साधन है।
7. ध्यान– तंत्र प्रत्यैकतानता ध्यानम्। (योग दर्शन 3/2)
धारणा का उसी स्थान पर लगाए रखना ध्यान है।
- मन को धारणा देश में सतत लगाए रहना ध्यान है।
- शान्ति एवं अलौकिक आनन्द ध्यान द्वारा प्राप्त होता है।
- मन का विषय रहित होना भी ध्यान है।
ध्यान के तीन प्रकार है-
- स्थूल ध्यान- किसी वस्तु या इष्टदेव की मूर्ति पर ध्यान करना।
- ज्योतिर्मय ध्यान- चमकती हुई दीप्तिवान वस्तु पर ध्यान केन्द्रित करना।
- सूक्ष्म ध्यान- निराकार ब्रह्म का ध्यान करना।
8. समाधि– तदेवार्थमात्रनिभासंस्वरूपशून्यमिव समाधि।
ध्यान करते करते ध्येय विषय अर्थात लक्ष्य को स्वरूप देखे और साधक स्वयं का स्वरूप भूल जाए वह समाधि है।
- जब ध्यान का स्वरूप शून्य जैसा हो जाए वह समाधि है। (योग दर्शन 3/3)
- ध्यान की पूर्णता से ध्याता, धृति और ध्येय लुप्त होने की स्थिति समाधि है।
- परमात्मा से पूर्ण एकाकार होना समाधि है।
- सविकल्पक समाधि – इसमें ज्ञाता, ज्ञेय, ज्ञानरूपी त्रिपुरी भाव में रहते हुए भी ब्रह्म स्वरूप भाव विभोर होता है।
- निर्विकल्प समाधि- इसमें ध्याता, ध्येय और ध्यान रूपी त्रिपुरी रहित होकर अखण्ड ब्रह्माकार हो जाता है।
- जीवात्मा का परमात्मा से एकीकरण ही निर्विकल्प समाधि है।
- समाधि के आनन्द को वाणी में वर्णित नही किया जा सकता है।
इस प्रकार अष्टांग योग को निम्न तीन भागों में बांटा गया हैः-
- बहिरंग योग- 1. यम 2. नियम 3. आसन 4. प्राणायाम
- प्रत्याहार योग
- अन्तरंग योग- 1. धारणा 2. ध्यान 3. समाधि.
बहुत ही लाभदायक सूचना आपका सहृदय धन्यवाद 🙏🙏
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