कमर दर्द – कारण, लक्षण और समाधान
कमर दर्द से परेशान हैं? कमर दर्द से राहत के लिए प्रभावी योगासन है- भुजंगासन, सेतुबंधासन और मकरासन जैसे सरल व असरदार योगासन, जो रीढ़ की हड्डी को मजबूत बनाते हैं, पीठ दर्द को कम करते हैं और शरीर को लचीलापन देते हैं। रोजाना अभ्यास से पाएँ दर्द-मुक्त और स्वस्थ जीवन।
● हमारी रीढ़ की हड्डी शरीर का एक महत्वपूर्ण अस्थि ढांचा है जो हमारे शरीर को सहारा देती है और हमें चलने, मुड़ने और हिलने-डुलने में मदद करती है।
● हमारी रीढ़ की हड्डी कशेरुकाओं (हड्डियों), डिस्क, जोड़ों, मुलायम ऊतकों, नसों और मेरुरज्जु (स्पाइनल कॉर्ड) से बनी होती है।
● व्यायाम हमारे रीढ़ की हड्डी को सहारा देने वाली कोर मांसपेशियों को मजबूत बना सकते हैं और पीठ की चोटों व दर्द को रोक सकते हैं।
● रीढ़ की हड्डी का स्थान: हमारी रीढ़ की हड्डी हड्डियों का स्तंभ है, जो हमारी गर्दन से लेकर हमारी पीठ के निचले हिस्से तक फैला होता है। यह हमारे खोपड़ी (सिर की हड्डी) के आधार से शुरू होकर हमारी पूँछ की हड्डी (जो श्रोणि का हिस्सा है) पर समाप्त होती है।
एक स्वस्थ रीढ़ की हड्डी में तीन प्राकृतिक वक्र होते हैं जो इसे S-आकार का बनाते हैं। ये वक्र झटकों को सोखने वाले (शॉक एब्ज़ॉर्बर) की तरह कार्य करते हैं, जिससे हमारी रीढ़ की हड्डी को चोट से बचाव मिलता है।
● कई हड्डियाँ और मुलायम ऊतक मिलकर हमारी रीढ़ की हड्डी का निर्माण करते हैं। ये एक-दूसरे के ऊपर ईंटों की तरह जुड़ते हैं और हमारे शरीर को विभिन्न तरीकों से सहारा देते हैं।
रीढ़ की हड्डी के भाग #1
कशेरुकाएँ (Vertebrae): हमारी रीढ़ की हड्डी में 33 कशेरुकाएँ (छोटी हड्डियाँ) एक-दूसरे के ऊपर जमी होती हैं, जो स्पाइनल कैनाल (मेरुरज्जु नलिका) का निर्माण करती हैं। यह नलिका एक सुरंग की तरह होती है, जिसमें हमारी मेरुरज्जु (स्पाइनल कॉर्ड) और नसें सुरक्षित रहती हैं। अधिकांश कशेरुकाएँ हिलती-डुलती हैं, जिससे हमें गति की एक सीमा मिलती है। सबसे नीचे की कशेरुकाएँ (सैक्रम और कॉक्सिक्स) आपस में जुड़ी होती हैं और हिलती नहीं हैं।
फेसेट जोड़ (Facet joints): ये जोड़ों में उपास्थि (कार्टिलेज) होती है, जो फिसलन वाला संयोजी ऊतक है। यह कशेरुकाओं को एक-दूसरे पर फिसलने की अनुमति देता है। फेसेट जोड़ों की मदद से हम शरीर को मरोड़ और घुमा सकते हैं, तथा ये हमारी रीढ़ की लचीलापन और स्थिरता बढ़ाते हैं।
रीढ़ की हड्डी के भाग #2
अंतरकशेरुकी डिस्क (Intervertebral disc): ये चपटे, गोल गद्दे जैसी संरचनाएँ कशेरुकाओं के बीच स्थित होती हैं और झटकों को सोखने वाले (शॉक एब्ज़ॉर्बर) की भूमिका निभाती हैं। हर डिस्क का केंद्र नरम, जेल जैसा पदार्थ (न्यूक्लियस पल्पोसस) से भरा होता है, जिसे एक लचीली बाहरी परत (एन्यूलस फाइब्रोसस) घेरे रहती है। इंटरवर्टिब्रल डिस्क पर लगातार दबाव रहता है, जिससे कभी-कभी न्यूक्लियस पल्पोसस बाहर निकलकर नसों को छू सकता है, जिससे सायटिका जैसे लक्षण उत्पन्न होते हैं।
स्पाइनल कॉर्ड और नसें: हमारी मेरुरज्जु नसों का एक स्तंभ है जो स्पाइनल कैनाल से होकर गुजरता है। यह हमारे सिर (खोपड़ी) से लेकर पीठ के निचले हिस्से तक फैला होता है। कुल 31 जोड़े नसें मेरुदंड के छिद्रों (न्यूरल फोरामेन) से बाहर निकलती हैं। ये नसें मस्तिष्क और मांसपेशियों के बीच संदेश ले जाती हैं।
रीढ़ की हड्डी के भाग #3
काउडा इक्वाइना तंत्रिका मूल (Cauda equina nerve root): काउडा इक्वाइना रीढ़ की नली के निचले सिरे पर स्थित नसों का एक समूह होता है, जो घोड़े की पूँछ जैसा दिखाई देता है। ये नसें निचले अंगों और श्रोणि के अंगों (जैसे मूत्राशय और आंत्र) से संदेश भेजने और प्राप्त करने का कार्य करती हैं। जब काउडा इक्वाइना की नसें दब जाती हैं या क्षतिग्रस्त होती हैं, तो काउडा इक्वाइना सिंड्रोम नामक स्थिति उत्पन्न होती है, जिसके लक्षण इस प्रकार हो सकते हैं:
● पीठ दर्द
● कमजोरी
● मूत्र या मल असंयम
● पैरों, नितंबों, पांव और एड़ियों में सुन्नता
● निचले अंगों में रिफ्लेक्स का कम होना
● यौन दुर्बलता
रीढ़ की हड्डी के मुलायम ऊतक (Soft tissues): लिगामेंट्स (बंधन) कशेरुकाओं को जोड़ते हैं ताकि रीढ़ अपनी स्थिति में बनी रहे। मांसपेशियाँ हमारी रीढ़ को सहारा देती हैं और गति प्रदान करती हैं। टेंडन (कंडरा) मांसपेशियों को हड्डियों से जोड़ते हैं और गति में सहायता करते हुए मांसपेशियों की चोटों से सुरक्षा प्रदान करते हैं। पीठ की सामान्य वक्रता और असामान्यताएँ: जब रीढ़ की हड्डी को बाजू से देखा जाता है, तो इसका आकार स्वाभाविक रूप से S-आकार का होता है, जो शरीर के संतुलन और झटकों को सोखने में मदद करता है।
लॉर्डोसिस — जब हमारी रीढ़ आगे की दिशा में असामान्य रूप से अधिक झुक जाती है। इस स्थिति में पीठ का निचला हिस्सा (lower back) अत्यधिक मुड़ा हुआ दिखाई देता है जिससे शरीर की सामान्य मुद्रा (posture) बिगड़ जाती है।
● स्कोलियोसिस — इसमें हमारी रीढ़ बगल की ओर (दाएँ या बाएँ) झुकती और घूमती है।
● काइफोसिस — इसमें हमारी वक्ष रीढ़ (thoracic spine, यानी गर्दन और पसलियों के नीचे के बीच का ऊपरी भाग) पीछे की दिशा में सामान्य से अधिक झुक जाती है। इस कारण व्यक्ति की पीठ झुकी हुई या कूबड़नुमा दिख सकती है।
डिस्क बल्ज / प्रोलैप्स्ड डिस्क (जिसे स्लिप्ड या हरनियेटेड डिस्क भी कहा जाता है) — यह तब होता है जब डिस्क के भीतर का जेल जैसा पदार्थ बाहर की ओर उभर आता है और किसी नस पर दबाव डालता है।
डिस्क डीसिकेशन — यह रीढ़ की हड्डी की डिस्क में से पानी (तरल) की धीरे-धीरे कमी होना है, जिससे वे सूखने और कमज़ोर होने लगती हैं। यह अवस्था उम्र बढ़ने के साथ सामान्य रूप से होती है।
स्पाइनल स्टेनोसिस — यह वह स्थिति है जब रीढ़ की नली (spinal canal), जिसके अंदर स्पाइनल कॉर्ड होती है, संकरी हो जाती है। इसके लक्षणों में हाथ-पैरों में झुनझुनी या सुन्नपन, कमजोरी, गर्दन या पीठ दर्द, पेशाब या मल त्याग की समस्या, और चलने या संतुलन बनाए रखने में कठिनाई शामिल हो सकती है।
सियाटिका — यह ऐसा दर्द है जो पीठ से शुरू होकर पैर तक जाता है। इसका कारण आमतौर पर सायटिक नस (sciatic nerve) या उसकी जड़ों पर दबाव पड़ना होता है।
कारण
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- भारी वजन उठाने या ज़्यादातर झुककर काम करने से मांसपेशियों में खिंचाव (Muscle strain)
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- अपच, कब्ज, गैस, अम्लता (acidity) आदि के कारण
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- तनाव (stress) या मांसपेशियों में ऐंठन (spasm) के कारण
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- डिस्क का उभरना, फटना, पतला होना या खिसकना (Disc bulge, herniation, tear, thinning)
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- गठिया (Arthritis), गुर्दे की पथरी (Kidney stone)
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- रीढ़ की हड्डी का कैंसर या संक्रमण (Spine cancer or infection)
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- स्पाइना बिफिडा (Spina bifida), मेनिंगोमायेलोसील (Meningomyelocoel)
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- स्कोलियोसिस (Scoliosis), ऑस्टियोपोरोसिस (Osteoporosis), लम्बर पंक्चर (Lumbar puncture), बैंबू स्पाइन (Bamboo spine)
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- गलत बैठने की मुद्रा (Poor sitting posture), कम्प्यूटर या सिलाई मशीन का अत्यधिक उपयोग
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- स्पॉन्डिलाइटिस / स्पॉन्डिलोसिस (Spondylitis / Spondylosis), स्लिप डिस्क, सायटिक नर्व पर दबाव
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- अत्यधिक यौन संबंध (Excessive sexual intercourse), मासिक धर्म (Menses), गर्भावस्था (Pregnancy)
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- बार-बार आगे की ओर झुकने की आदत
लक्षण (Symptoms)
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- शरीर के वजन का असंतुलन
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- कमर में सूजन, जकड़न और दर्द
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- उठने-बैठने या लेटने में कठिनाई
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- कमर के निचले हिस्से, पैरों और उंगलियों में सुन्नपन और दर्द, बिजली के झटके जैसा दर्द (shooting pain)
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- मूत्र या मल त्याग में समस्या (Urine and stool discharge)
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- यह दर्द अस्थायी भी हो सकता है कुछ आराम या हल्के व्यायाम से ठीक हो जाता है, लेकिन कई बार यह लंबे समय तक बना रहता है जिससे रोज़मर्रा के कामों में बहुत असुविधा होती है।
कमर दर्द से राहत के लिए प्रभावी योगासन
भुजंगासन –
भुजंगासन, जिसे कोबरा पोज़ भी कहते हैं, एक महत्वपूर्ण योगासन है जिसमें शरीर फन उठाए हुए सांप की तरह दिखता है। यह सूर्य नमस्कार के 12 आसनों में से 8वां आसन है। तथा कमर दर्द से राहत के लिए प्रभावी योगासन है।
भुजंगासन करने की विधि

सबसे पहले फर्श पर अपने पेट के बल लेट जाएं और अपने पैरों के अंगूठे जमीन पर सपाट रखें, तलवे ऊपर की ओर हों, अपने पैरों को एक दूसरे के पास रखें और माथा जमीन पर टिकाएं। दोनों हाथों की हथेलियों को अपने कंधों के नीचे जमीन पर रखें, कोहनियां शरीर के पास और समानांतर होनी चाहिए.
अब धीरे-धीरे गहरी सांस लेते हुए अपने सिर, छाती और पेट को ऊपर उठाएं। अपनी नाभि को जमीन पर ही रखें, अपने हाथों के सहारे अपने धड़ को पीछे की ओर खींचकर फर्श से ऊपर उठाएं और दोनों हथेलियों पर समान दबाव डालें। अपनी रीढ़ की हड्डी को एक-एक करके मोड़ते हुए सजगता से सांस लेते रहें, यदि संभव हो तो अपनी पीठ को जितना हो सके उतना झुकाकर अपनी भुजाओं को सीधा करें और अपने सिर को पीछे झुकाएं तथा ऊपर देखें।
इस मुद्रा को 4-5 बार समान रूप से सांस लेते हुए बनाए रखें, फिर सांस छोड़ते हुए धीरे से अपने पेट, छाती और सिर को फर्श पर वापस लाएं और विश्राम करें। इस प्रक्रिया को 4-5 बार दोहराएं।
भुजंगासन के लाभ
मेरुदंड को मजबूती – यह आसन रीढ़ की हड्डी को मजबूत बनाता है और उसमें लचीलापन लाता है। संपूर्ण पीठ और कंधों को मजबूत बनाता है तथा ऊपरी और मध्य पीठ के लचीलेपन में सुधार करता है।
यह आसन सीने और फेफड़ों को फैलाता है, कंधों और पेट को लाभ मिलता है। पेट को टोन करता है और पेट के सभी अंग उद्दीप्त होते हैं। रक्त परिसंचरण में सुधार करता है और थकान तथा तनाव कम करता है।
हृदय और फेफड़े खुल जाते हैं और यह दमा की चिकित्सा में सहायक है। कमर दर्द और गर्दन के दर्द से राहत पाने में मदद करता है। पारंपरिक ग्रंथों में कहा गया है कि भुजंगासन शरीर की गर्मी को बढ़ाता है, बीमारियों को दूर भगाता है और कुंडलिनी जागृत करता है।
सावधानियां
यदि आप गर्भवती हैं तो भुजंगासन का अभ्यास करने से बचें। अगर आपकी पसलियों या कलाई में फ्रैक्चर है, या हाल ही में हर्निया जैसी पेट की सर्जरी हुई है, तो इस योगासन का अभ्यास करने से बचें। सुनिश्चित करें कि आप इस आसन को अपने मुख्य भोजन के 4-5 घंटे बाद करें। योगासन का अभ्यास सदैव सुबह के समय करना सर्वोत्तम होता है, हालांकि यदि आप ऐसा करने में असमर्थ हैं तो शाम को समय निकाल सकते हैं।
सेतु बंधासन (bridge pose) –
सेतुबंधासन का नाम दो शब्दों से बना है: “सेतु” का अर्थ पुल और “बंध” का अर्थ बाँधना। इस आसन में शरीर की मुद्रा एक पुल के समान होती है, इसलिए इसे ब्रिज पोज़ भी कहते हैं। भारतीय योगियों ने किसी नदी या दुर्गम स्थान को पार करने के लिए बनाए जाने वाले पुल से प्रेरणा लेकर इस आसन की रचना की है, व कमर दर्द से राहत के लिए प्रभावी योगासन है।
सेतुबंधासन करने की विधि
सबसे पहले योगा मैट पर अपनी पीठ के बल सीधा लेट जाएँ। अपने घुटनों को मोड़ें और पैरों को कूल्हों के पास ले आएं, तलवे जमीन पर रखें। पैरों के बीच कूल्हों के बराबर दूरी बनाए रखें और उन्हें श्रोणी क्षेत्र (पेल्विक एरिया) से लगभग 10 से 12 इंच आगे रखें। ध्यान रखें कि घुटने और एड़ियां एक सीध में हों।
हथेलियां नीचे फर्श की ओर रखते हुए अपनी बाजुओं को शरीर के बगल में रख दें, अब गहरी सांस लेते हुए धीरे-धीरे कमर को ऊपर उठाएं। सबसे पहले अपनी पीठ का निचला भाग, फिर बीच का भाग और अंत में ऊपर का भाग धीरे-धीरे फर्श से ऊपर उठाएं।
कंधों को हल्का सा ऊपर उठाते हुए छाती को बिना ठोड़ी को नीचे लाए, ठोड़ी के साथ स्पर्श कराएं। इस अवस्था में सिर और कंधे ज़मीन से लगे रहें।आपके शरीर का सारा भार कंधों, बाजुओं और पांवों पर टिका होना चाहिए, पैरों से मजबूती से ज़मीन पर दबाव दें और जांघों को आपस में समानांतर रखें।
यदि आप चाहें तो हाथों की उंगलियों को साथ मिलाते हुए हाथों को जमीन की ओर दबाकर धड़ को थोड़ा और ऊपर उठा सकते हैं। आराम से सांस लेते-छोड़ते रहें, इस मुद्रा में 20-30 सेकंड से लेकर एक-दो मिनट तक बने रहें। फिर धीरे-धीरे सांस छोड़ते हुए आराम से आसन से बाहर आ जाएं। 10-15 सेकंड तक आराम करने के बाद फिर से दोहराएं।
सेतुबंधासन के लाभ
रीढ़ की हड्डी के लिए – यह आसन रीढ़ की हड्डी को मजबूत बनाता है और उसमें लचीलापन बढ़ाता है। छाती, गर्दन और रीढ़ की हड्डी में अच्छा खिंचाव पैदा करता है।
मानसिक स्वास्थ्य – मस्तिष्क को शांत करता है और तनाव, चिंता, थकान तथा हल्के अवसाद को कम करने में मदद करता है। इस आसन में हमारा हृदय सिर से ऊपर होता है, जिससे रक्त का प्रवाह हमारे सिर की तरफ बढ़ जाता है। इससे एंग्जाइटी, अनिद्रा और सिरदर्द से निपटने में मदद मिलती है।
शारीरिक लाभ – पाचन में सुधार लाता है और मेटाबोलिज्म को बेहतर बनाता है, कमर दर्द में फायदेमंद है। रक्त संचार सुधारता है यह पेट के अंगों, फेफड़ों और थायराइड ग्रंथि को सक्रिय करता है। और फेफड़ों की क्षमता बढ़ाता है। यह आसन उन लोगों के लिए विशेष रूप से लाभकारी है जो दिन भर कंप्यूटर या लैपटॉप के सामने बैठकर काम करते हैं।
सावधानियां
गर्भवती महिलाओं को यह आसन नहीं करना चाहिए, गर्दन या पीठ में गंभीर चोट होने पर इस आसन से बचें, अपनी क्षमता से ज्यादा पीठ न मोड़ें – अभ्यास के साथ धीरे-धीरे आप ज्यादा कर सकते हैं।
मकरासन (crocodile pose) –
मकरासन संस्कृत के दो शब्दों से मिलकर बना है – “मकर” का अर्थ मगरमच्छ और “आसन” का अर्थ मुद्रा है। इस आसन को करते समय शरीर का आकार नदी में शांत अवस्था में लेटे हुए मगरमच्छ की भांति प्रतीत होता है, इसलिए इसे क्रोकोडाइल पोज़ भी कहा जाता है। यह एक विश्राम देने वाला आसन है जो पूरे तंत्रिका तंत्र, शरीर और मन को आराम देता है, तथा कमर दर्द से राहत के लिए प्रभावी योगासन है।
मकरासन करने की विधि
समतल और स्वच्छ जगह पर योग मैट बिछाकर पेट के बल लेट जाएं। कंधों और चेहरे को थोड़ा ऊपर उठाकर बाजुओं को कोहनी से मोड़ लें। दोनों हथेलियों को एक-दूसरे के ऊपर रखें और चेहरे को हथेलियों पर इस प्रकार टिकाएं कि आराम से हाथों पर टिक जाए।
कोहनियां न तो अधिक आगे की ओर हों और न ही छाती के नीचे – अगर कोहनियां ज़्यादा आगे होंगी तो गर्दन पर अधिक दबाव पड़ेगा, शरीर के करीब होंगी तो पीठ पर अधिक दबाव पड़ेगा। अपने शरीर के हिसाब से कोहनियों की सही जगह चुनें जहां आपको पीठ और गर्दन में पूरी तरह से आराम महसूस हो पैर सीधे रखें।
अपने पूरे शरीर को ढीला छोड़ दें और आंखें बंद कर लें। सहज भाव से लयबद्ध तरीके से श्वास लेते और छोड़ते रहें, प्रारंभ में 30 सेकंड से 3 मिनट तक करें, धीरे-धीरे अभ्यास करते हुए समय सीमा को 5-10 मिनट तक बढ़ाया जा सकता है।
मकरासन के लाभ
मानसिक स्वास्थ्य – यह एक ऐसा आसन है जिसमें आंखें बंद रखकर श्वास लेने की क्रिया की जाती है, जिसके कारण यह शरीर और दिमाग को बिल्कुल शांत रखता है। डिप्रेशन, बेचैनी, उलझन, माइग्रेन और मस्तिष्क से जुड़े विकारों को दूर करता है। सिर दर्द से परेशान लोगों के लिए यह आसन दवा का कार्य करता है।
रीढ़ की हड्डी और मांसपेशियां – पूरे तंत्रिका तंत्र को आराम देता है, खास तौर से पीठ को, यह आसन स्लिप-डिस्क, कटिस्नायुशूल (साइटिका), पीठ के निचले हिस्से में दर्द या किसी अन्य स्पाइनल परेशानी से पीड़ित लोगों के लिए बहुत प्रभावी है। कंधों और रीढ़ की मांसपेशियों में तनाव कम होता है और मांसपेशियां मजबूत और लचीली बनती हैं।
श्वसन तंत्र – मकरासन का अभ्यास करते समय गहरी सांस लेने और छोड़ने की प्रक्रिया से अस्थमा की बीमारी में लाभ होता है। फेफड़े से जुड़ी समस्याएं भी दूर होती हैं।
पाचन तंत्र – इस आसन को करते समय शरीर पेट के बल लेटा होता है, जिससे पेट पर हल्का दबाव पड़ता है। यह दबाव पाचन अंगों को सक्रिय करता है, गहरी और धीमी सांस लेने से शरीर में ऑक्सीजन फ्लो बढ़ता है, जिससे पाचन क्रिया बेहतर होती है और गैस, कब्ज और अपच जैसी समस्याओं में राहत मिलती है।
अन्य लाभ – शरीर की थकान और दर्द से राहत, गर्दन की अकड़न को कम करना, पेट की मांसपेशियों को टोन करना और घुटनों में दर्द से राहत। स्त्रियों में कमर दर्द की समस्या को दूर करने में भी यह आसन बहुत फायदेमंद है।
सावधानियां
मकरासन का अभ्यास तनाव रहित मन और मस्तिष्क के साथ किया जाना चाहिए क्योंकि यह आराम की मुद्रा में लेटने की क्रिया है। इस आसन को करने का सही समय सुबह है, क्योंकि इसके लिए एकदम शांत जगह और वातावरण की जरूरत होती है। पेट खाली होना चाहिए. इस आसन का अभ्यास करते समय शरीर को सीधे रखें और किसी भी कोण पर घुमाएं नहीं। शरीर में अधिक तनाव पैदा न करें और शांत दिमाग से मकरासन का अभ्यास करें तभी यह फायदेमंद साबित होगा।
योग करते समय ध्यान रखें – कमर दर्द से राहत के लिए प्रभावी योगासन को करते समय निम्न बातों का ध्यान रखें।
इन्हे सुबह खाली पेट अभ्यास करना सबसे बेहतर होता है।
आसनें के बीच में 20-30 सेकंड आराम लें।
नियमित अभ्यास ही स्थाई लाभ देता है। योग के लाभ वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित है।
निष्कर्ष – यह कमर दर्द से राहत के लिए प्रभावी योगासन ना केवल पीठ/कमर दर्द को ठीक करते है, बल्कि आपके शरीर की बनावट और आत्मविश्वास को बेहतर बनाते है।
” सही आसन, स्वस्थ जीवन ”
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