प्रस्तावना- समाज में दिनोंदिन बढ़ती तनाव की समस्या ने प्रत्येक आयु वर्ग के लोगों को अपनी चपेट में ले लिया है। यह लेख तनाव लक्षण, कारण एं तनाव प्रबंधन गसी विषय पर केन्द्रित है। तनाव के कारण मनुष्य को अनेक प्रकार के शारीरिक और मानसिक कष्टों का सामना करना पड़ रहा है। पाश्चात्य सभ्यता के अन्धानुकरण ने मनुष्य के अस्तित्व के लिए संकट खड़ा कर दिया है। आधुनिक कृत्रिमता ने मनुष्य और प्रकृति के मध्य गहरी खाई खोद दी है। विकृत आहार सेवन और बनावटी जीवन शैली ने तन और मन के सुख व चैन को छीनकर शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव डाला है। ऐसी दशा में मानवीय समुदाय के सम्मुख शान्ति का भंग होना और तनाव का उत्पन्न होना स्वाभाविक है। ऐसी विषम परिस्थितियों में वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति अत्यन्त प्रासंगिक एवं उपयोगी है। आधुनिकता की बढ़ती होड़ में मनुष्य का अपना वास्तविक स्वरूप खोता जा रहा है। योग के क्रमिक रूप से उत्तरोतर विकसित अभ्यासों के द्वारा मनुष्य को अपने अस्तित्व का बोध होता है और उसकी मौलिकता उभर कर सामने आती है। प्राकृतिक चिकित्सा द्वारा मनुष्य का प्रकृति के पंच तत्वों से सहज सम्पर्क स्थापित होता है, परिणामस्वरूप उसे मानसिक तृप्ति एवं तनाव मुक्ति का आभास होता है। आहार के अन्तर्गत पथ्य सेवन से जैसा लाभ मिलता है और मानसिक द्वन्द दूर होता है। उपयुक्त जीवन शैली प्रतिदिन के जीवनक्रम में होने वाले व्यतिरेको को दूर करती है. जिससे प्रगति का मार्ग प्रशस्त होता है और तनाव दूर होता है।
आधुनिकता की बाहरी चकाचौंध के युग में मनुष्य अपनी वास्तविकता से वंचित होता जा है। जिसके कारण उसकी वास्तविक प्रगति का द्वार अवरूद्ध हो रहा है और वह तनाव गिरफ्त में फँसता जा रहा है। ऐसे संकट के समय में वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति के अन्तर्गत योग चिकित्सा, प्राकृतिक चिकित्सा, आहार चिकित्सा एवं उपयुक्त जीवन शैली का चयन तनाव के निवारण के लिए अत्यन्त मौलिक, प्राकृतिक, प्रासंगिक एवं निरापद है।
तनाव का स्वरूप-
आधुनिक भाग-दौड़ के युग में तनाव भयावह समस्या का रूप लेता जा रहा है। वर्तमान दौर में मनुष्य की अधिकांश बीमारियों का कारण तनाव है। मानवीय क्रियाओं, विचारों एवं भावनाओं के पारस्परिक द्वन्द के परिणाम स्वरूप मनःस्थिति एवं परिस्थिति के मध्य असंतुलन एवं असमायोजन से तनाव उत्पन्न होता है। तनाव जीवन में अनेकानेक मनोविकारों का समावेश करता है। जिससे शरीर अस्वस्थ, मन अशान्त और भावनाएं अस्थिर होने से मनुष्य के शारीरिक एवं मानसिक विकास में अवरोध उत्पन्न होता है।
दर्शन शास्त्र एवं आयुर्वेद में मन के तीन गुण सत्व, रज और तम बताये गये है। मन का सम्पूर्ण व्यापार इन त्रिगुणों की पारस्परिक क्रिया से सम्बद्ध है। मन सन्निबद्ध गुण के प्रभाव के अनुरूप बर्ताव करता है। सत, रज और तम विविध मानसिक भावों को उत्पन्न करते है। इन्हें मानसिक गुण या मानसिक दोष कहा जाता है। सत्त्वगुण शुद्ध, प्रकाशक एवं अविकारी होने के कारण मानसिक व्याधियों का हेतु नहीं हो सकता है। अतः सत्व में कभी विकृति न होने के कारण हमेशा गुण ही रहता है। रज और तम विकारी होने के कारण बहुत सारी मानसिक व्याधियों के कारण माने गये है।
रज और तम जब विकृत होकर मन को दूषित करके विभिन्न मानसिक व्याधियों को उत्पन्न करते है तो दोष कहे जाते है। तनाव के लिए उत्तरदायी कोई न कोई राजसिक वृत्ति यथा राजसी परिवेश, साधनों का संग्रह, मान-सम्मान की अभिलाषा, पद की आकांक्षा इत्यादि तथा तामसिक वृत्ति के रूप में आलस्य, मोह, द्वेष एवं वासनाएँ इत्यादि है।
तनाव एक स्थिति तक सामान्य व्यक्तित्व विकास के लिए उपयोगी है। इसकी अधिक मात्रा व्यक्ति को मनोवैज्ञानिक रूप से बीमार कर देती है। नकारात्मक तथा तनाव युक्त घटनाए कई प्रकार के मानसिक विकार उत्पन्न करती है। जिसका सम्बन्ध सामान्यतः शारीरिक, जटिल पारिवारिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक या जैविक घटकों से होता है। ये घटक मनुष्य में शारीरिक और मानसिक बैचेनी उत्पन्न करके कई प्रकार के रोग को निमन्त्रण देते हैं।
परिभाषाएं-
मनोवैज्ञानिकों ने तनाव की परिभाषा कई दृष्टिकोणों के आधार पर दी है-
क) तनाव उद्दीपक कारकों के रूप में-
कोई भी घटना या परिस्थिति जो व्यक्ति को असाधारण अनुक्रिया करने के लिए बाध्य करती है, तनाव कहलाती है। उदाहराणार्थ भूकम्प, नौकरी का छूटना, प्रियजनों की मृत्यु आदि घटनाए।
ख) तनाव अनुक्रिया के रूप में-
मनुष्य मनोवैज्ञानिक अनुक्रियाओं के रूप में चिन्ता, क्रोधादि तथा दैहिक अनुक्रियाएं यथा नींद में व्यवधान, रक्तचाप का बढ़ना, पाचन तंत्र का ठीक से कार्य न करना आदि के माध्यम से तनाव को प्रकट करता है।
“तनाव से तात्पर्य शरीर द्वारा आवश्यकतानुसार किए गए अविशिष्ट अनुक्रिया से होता है।”
ग) तनाव उद्दीपक और अनुक्रिया दोनों के संबंध के रूप में-
तनाव (Stress) एक बहुआयामी प्रक्रिया है, जो व्यक्ति के जीवन में होने वाली विभिन्न घटनाओं और परिस्थितियों के प्रति प्रतिक्रिया के रूप में उत्पन्न होता है। यह तनाव हमारे दैहिक (शारीरिक) और मनोवैज्ञानिक (मानसिक) कार्यों को प्रभावित कर सकता है, जिससे व्यक्ति की कार्यक्षमता, व्यवहार और स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। तनाव की विशेषताएँ-
1 तनाव एक प्रकार की अनुक्रिया है।
2 तनाव एक बहुआयामी प्रक्रिया है क्योंकि इसको उत्पन्न करने वाले अनेक कारण हो सकते है।
3. तनाव उत्पन्न करने वाली परिस्थितियाँ व्यक्ति के नियंत्रण से बाहर होती है।
4. तनाव में व्यक्त्ति को मानसिक एवं शारीरिक दोनों तरह के कष्टों का सामना करना होता है।
5. तनाव उत्पन्न करने वाली परिस्थितियों या घटनाओं के स्वरूप के आधार पर तनाव समयावधि कम या अधिक हो सकती है।
तनाव के प्रकार-
तनाव ‘यूस्ट्रेस’ और ‘डिस्ट्रेस’ दो प्रकार का होता है। यूस्ट्रेस सकारात्मक जबकि डिस्ट्रेस नकारात्मक तनाव है। यूस्ट्रेस के अन्तर्गत किसी कार्य विशेष के दौरान तनाव तथा दबाव की थोड़ी मात्रा बनी रहती है जो कार्य को बेहतर ढंग से सम्पादित करने के लिए प्रेरित करती है। यूस्ट्रेस मन में उत्साह का संचार करता है। डिस्ट्रेस में तनाव अत्यधिक या अनियन्त्रित होता है।
तनाव के लक्षण-
मनोवैज्ञानिकों ने तनाव के लक्षण को मुख्यतः शारीरिक, मानसिक एवं व्यवहार के अन्तर्गत रखा है-
1. शारीरिक लक्षण- तनाव के शारीरिक प्रभाव का सम्बन्ध मुख्यतः न्यूरोलॉजिकल, एंडोक्राइन एवं इम्युनोलॉजिकल संस्थानों से है। एक अध्ययन के अनुसार तनाव का लम्बा दौर मनुष्य की एड्रीनल एवं पिट्यूटरी जैसी अन्तःस्रावी ग्रंथियों को असामान्य रूप से उत्तेजित कर देता है ऐसे में ये ग्रंथियाँ लाभकारी हॉर्मोनों के स्थान के हानिकारक हॉर्मोन रसायनों का स्रावण करने लगती हैं। तनाव के दौरान सिम्पैथेटिक स्नायुसंस्थान सक्रिय हो जाता है। सामान्य क्रम में शरीर का इम्युनोलॉजिकल तन्त्र प्रतिरक्षा का कार्य करता है, परन्तु उस पर लगातार अतिरिक्त दबाव पड़ने से उसकी कार्यशक्ति घटने लगती है, और शरीर विभिन्न प्रकार के रोगों का शिकार होने लगता है।
अन्तःस्रावी ग्रंथियों से ऐड्रीनलिन तथा नॉरऐड्रीनलिन का स्रावण होने लगता है। जिसके प्रभाव में उत्पन्न शारीरिक लक्षणों में हृदय की धड़कन बढ़ जाती है, है, मांस-पेशियों के कड़े होने से हाथ-पैर तन जाते है और उदर कड़ा हो जाता है, रक्त चाप बढ़ जाता है, रक्त का प्रवाह अंतरांगों से वाह्य परिधीय अंगों की ओर हो जाता है, पाचन क्रिया पर प्रतिकूल असर पड़ता है, श्वास की संख्या बढ़ जाती है।
2 मानसिक लक्षण- तनाव मन पर अत्यन्त गहरा प्रभाव डालकर मानसिक पीड़ा पहुँचाता है। इसका समय रहते यदि उपचार न किया जाये तो यह शरीर को विभिन्न प्रकार के मनोशारीरिक रोगों का आश्रय-स्थल बना देता है। तनाव के मानसिक लक्षण के अन्तर्गत-मन का कहीं पर न लगना, आत्म विश्वास का निम्न स्तर, बार-बार गुस्सा आना या चिड़चिड़ाहट, घबराहट, अकारण भय का अनुभव, एकाग्रता की कमी, लेखन में अक्षर का आगे पीछे लिख जाना, लोभी प्रवृत्ति एवं निर्णय लेने में असमर्थता इत्यादि आते है।
3 व्यवहारगत लक्षण- व्यवहार के माध्यम से प्राणी अपने आपको अभिव्यक्त करता है। अच्छे व्यवहार द्वारा वह दूसरों को प्रभावित करता है। भिन्न-भिन्न तनाव कारकों का मानवीय व्यक्तित्व पर प्रभाव विभिन्न रूपों में होता है) और उसकी व्यवहारगत अभिव्यक्ति में भी असमरूपता होती है। साधारणतया तनाव की साधारण अवस्था के सकारात्मक परिणाम होते है और व्यक्ति का व्यवहार समायोजित रहता है। तीव्र तनाव के प्रभाव नकारात्मक होते है और व्यक्ति के व्यवहार पर विपरीत प्रभाव डालते है। तनाव के दौरान सामान्यतः सामाजिक सम्बन्ध भी बाधित होते है। तनाव की अवस्था में व्यक्ति के व्यवहार में प्रदर्शित होने वाले कुछ परिवर्तनों के अन्तर्गत- भूख का अत्यधिक बढ़ या घट जाना, शराब एवं धूम्रपान की लत, बहुत जल्दी नर्वस हो जाना, नाखून चबाना, मुँह सूखना एवं जल्दी-जल्दी प्यास लगना, समस्याओं के निराकरण में विफल साबित होना, शीघ्र क्रोधित हो जाना, अवसाद ग्रसित होना आदि आता है।
तनाव के कारण – तनाव को उत्पन्न करने वाले प्रमुख कारण निम्नलिखित है-
1. स्वास्थ्य सम्बन्धित परेशानियाँ- स्वस्थ शरीर और स्वच्छ मन मानवीय उन्नति के दो प्रमुख द्वार है। इनमें से किसी पर भी आघात लगने पर न केवल उन्नति का द्वार अवरूद्ध होता है अपितु जीवन के लिए भी संकट खड़ा हो जाता है। गिरते स्वास्थ्य के लिए जिम्मेदार अंग विशेष दूसरे सम्बन्धित अंगों को भी अपनी चपेट में ले लेता है, जिससे व्यक्ति शारीरिक रूप से अपाहिज हो जाता है। शारीरिक रोग मनुष्य को असमायोजित करके तनाव को जन्म देता है। जबकि मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य के संकट से मानवीय व्यक्तित्व के विविध आयाम यथा-व्यवहार, संज्ञान इत्यादि पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। स्वंय का या परिवार के किसी सदस्य का बीमार या चोटग्रस्त होना, तनाव को उत्पन्न करता है। शारीरिक रूग्णता और मानसिक अस्वस्थता के साथ-साथ औषधियों के प्रतिकूल प्रभाव भी मानसिक तनाव के हेतु है।
2. परिवारिक उत्तरदायित्व सम्बन्धित कारण- घरेलू स्तर पर ऐसे अनेको उत्तरदायित्व है जिनमें से कुछ मनुष्य को प्रायः और कुछ यदा-कदा तनाव से व्यथित करते है। उदाहरणार्थ- पारिवारिक असन्तुलन, घर का रख-रखाव, भोजन की व्यवस्था, भारी कर्ज की अदायगी, आर्थिक संकट, बच्चों की शिक्षा के दायित्व, मकान बनवाना या निवास स्थान का बदलना आदि।
3. कार्याधिक्य- आधुनिक भागदौड़ के युग में कार्य के अतिरिक्त दबाव से व्यक्ति तनाव का शिकार हो जाता है। जैसे-विभिन्न प्रकार के दायित्वों और कर्तव्यों का एक साथ पालन, केरियर बनाने के लिए किया गया कठोर श्रम, समय की अल्पता इत्यादि।
4. पर्यावरणीय परेशानियाँ- मनुष्य के आस-पास का पर्यावरण एवं वातावरण सतत एक दूसरे को पोषित एवं प्रभावित करते है। ध्वनि प्रदूषण, वायु प्रदूषण, पारिवारिक दायित्वों का दबाव, विपन्न पड़ोस तथा समाज में संव्याप्त अपराध एवं भ्रष्टाचार आदि मानवीय मन के समक्ष तनाव का सकंट खड़ा कर देते हैं।
5. असुरक्षा- सुरक्षा की भावना से मनुष्य जीवन के प्रति आशान्वित होता है। किन्तु बेरोजगारी, परीक्षा में असफल होने का भय, महंगाई, सेवा निवृत्ति तथा कभी-कभी ज्योतिषीय भविष्यवाणी, अनिष्ट के घटने का भय आदि असुरक्षा के भाव को उत्पन्न करके तनाव को जन्म देते है।
6. आन्तरिक दिक्कतें- आन्तरिक परिवेश में उपजी प्रतिकूल मनोदशा मनुष्य को तनाव के लिए बाध्य करती है। इसके अन्तर्गत अकेलेपन का भाव, आपसी मनमुटाव, समाज का मुकाबला कर पाने में अपने को असक्षम पाना आदि आता है।
7. आजीविका अर्जन में परेशानियाँ- आजीविका मानवीय निर्वाह का साधन है। आजीविका अर्जन के मार्ग में आने वाली दिक्कतें मनुष्य को तनाव से ग्रसित कर देती है। जैसे व्यवसाय या नौकरी का बार-बार बदलना, व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा एवं असफलता, अधिकारी तथा सहकर्मियों में मतभेद, अनिश्चित आजीविका, अनिच्छित कार्य, कार्य असन्तुष्टि आदि मुख्य है।
8. निराशा- आवश्यकता सन्तुष्टि या इच्छापूर्ति के मार्ग में बाधा उत्पन्न होने पर मनुष्य की मानसिक प्रतिक्रिया निराशा के रूप में होती है जो परिणामतः तनाव को जन्म देती है। यहाँ पर वाह्य और आन्तरिक दोनों प्रकार के कारक निराशा उत्पत्ति के लिए उत्तरदायी हो सकते है। वाह्य कारकों के अन्तर्गत भूकम्प, बाढ़, कई प्रकार के सामाजिक नियम या प्रतिबन्ध, गरीबी इत्यादि के कारण मनुष्य प्रबल निराशा का शिकार हो जाता है। वाह्य कारकों के विपरीत आन्तरिक कारक मनुष्य में व्यक्तिगत रूप से कार्य करके निराशा को उत्पन्न करता है जैसे किसी प्रकार की शारीरिक विकृति, उच्च महत्वकाक्षां, परिक्षाओं में असफल होने का भय तथा मानसिक संघर्ष इत्यादि।
9. जीवन में घटित अप्रिय घटनाए- जीवन क्रम में यदा-कदा ऐसी घटनाएं घटित होती है जो जीवन के अस्तित्व के लिए महासंकट खड़ा कर देती है। जिसके कारण मनुष्य तीव्र तनाव का शिकार हो जाता है जैसे प्रियजन की मृत्यु, तलाक या अचानक उत्पन्न आर्थिक संकट आदि।
तनाव का प्रबंधन- तनाव प्रबन्धन के लिए वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति आधुनिक युग की महती आवश्यकता गयी है। मानवीय समुदाय का प्रत्येक वर्ग चाहे वह बालक, तरूण, युवा या वृद्ध किसी वर्ग में आता हो कहीं न कहीं अपने-आपको तनाव से घिरा हुआ पाता है। जिसके निवारण में वैकल्पिक चिकित्सा की भूमिका अतुलनीय है। सन्तुलन को कायम चिकित्सा, प्राकृतिक चिकित्सा आहार चिकित्सा एवं उपयुक्त जीवन शैली का प्रयोग के प्रबन्धन में सक्षम एवं समर्थ है। यहाँ योग चिकित्सा, प्राकृतिक आहार चिकित्सा और उपयुक्त जीवनशैली के माध्यम से तनाव प्रबन्धन से अवगत जा रहा है।
योग द्वारा तनाव प्रबन्धन-
मानवीय मन और मस्तिष्क का योग से वियोग और योग विरोधी तत्वों के साथ संयोग तनाव की उत्पत्ति का प्रमुख कारण है। भौतिकता प्रधान आधुनिक युग में यान्त्रिकता का अन्धाधुंध प्रयोग और प्रतियोगिता की होड़ में उत्पन्न जीवन की व्यस्तता, मनुष्य को कदम-कदम पर तनाव का अहसास देती है। शहरी भाग-दौड़ युक्त जीवन, वातावरण में बढ़ता प्रदूषण, पारिवारिक और सामाजिक समस्याएं तनाव में उत्तरोत्तर वृद्धि करती हैं।
यौगिक क्षेत्र में सफलता प्राप्ति के लिए योगाभ्यासी के मन में सहज उल्लास का होना आवश्यक है। यौगिक प्रक्रियाओं का अभ्यास प्रसन्नता और उल्लास के साथ दीर्घकाल तक धैर्यपूर्वक करने पर सिद्धि निश्चित रूप से मिलती है। योगाभ्यासी क्रमिक रूप से योग की उच्चस्तरीय कक्षाओं में प्रवेश करता है। हठप्रदीपिका के अन्तर्गत योग में सिद्धि के लिए उल्लास को योग के साधक तत्वों में रखा गया है।
योग शास्त्रों में ऐसी अनेकानेक विधियाँ एवं पद्धतियाँ महर्षियों द्वारा बतायी गयी हैं जिसका जीवन के विविध क्षेत्रों में सम्यक् अनुसंधान मनुष्य को तनाव जैसी द्वन्दात्मक अवस्था से निकाल कर उसके जीवन में सुख एवं शान्ति की स्थापना करता है। इस प्रकार योग तनाव की चिकित्सा के साथ-साथ जीवन को सफल एवं सम्मुनत भी बनाता है।
चिकित्सीय शोधों से पता चलता है कि तनाव से मनुष्य को अत्यधिक क्षति होती है। शोध निष्कर्षों में पाया गया कि एक घन्टे का क्रोध एक दिन के बुखार जितनी हानि पहुँचाता है। तीव्र शोक और उद्वेग के कष्टकर पलों में नींद एवं भूख आदि गायब हो जाते हैं। विभिन्न कारणों से उत्पन्न होने वाला तनाव सामयिक कष्ट के साथ दूरगामी दुष्परिणाम भी साथ लाता है।
तनाव के पलों में कभी-कभी शरीर या मन इतने ज्यादा उत्तेजित एवं अस्त-व्यस्त हो जाते है जिसके लिए स्वाभाविक नींद भी प्रभावहीन होने लगती है। प्राकृतिक रूप में गहन निद्रा थकान मिटाने का सबसे सरल और उपयोगी माध्यम है। थकाहारा व्यक्ति जब रात्रि को गहन निद्रा में सो जाता है तो सुबह उठकर उसमें नयी स्फूर्ति, ताजगी एवं प्रसन्नता का संचार होता है। प्राकृतिक निद्रा में तनाव एवं थकान को मिटाने की स्वाभाविक विशेषता है। तनाव मनुष्य की सहज नींद की वृत्ति को छीन लेता है। जिससे उसकी नींद में व्यवधान उत्पन्न हो जाता है और ऐसी दशा में उसे नींद नहीं आती या फिर बहुत हल्की नींद आती है। ऐसी नींद तनाव एवं थकान को मिटाने में असफल सिद्ध होती है।
योग के उच्च अभ्यासों के लिए आसन में स्थिरता आवश्यक है। आसन में स्थिर होने के लिए गत्यात्मक एवं शरीर संवर्धनात्मक आसनों द्वारा शरीर को दृढ़ एवं जीवनीशक्ति से परिपूर्ण बनाया जाता है। शरीर के साथ-साथ मन की दृढ़ता एवं स्थिरता आवश्यक है जिसके लिए शिथिलीकरण सर्वसुलभ अभ्यास है। शिथिलीकरण के नियमित अभ्यास से विचारों एवं भावनाओं की द्वन्दात्मक स्थितियाँ समाप्त होती है। जिससे मानसिक शान्ति की प्राप्ति होती है और शान्त मन में तनाव का सर्वथा अभाव होता है।
शिथिलीकरण- शरीर की स्वाभाविक चेष्टाओं को शिथिल कर देना शिथिलीकरण है। शिथिली करण की प्रक्रिया में शरीर को पूरी तरह से ढीला और मन को पूर्णतः खाली करना होता है। तनाव को मिटाने का सरल उपाय शिथिलीकरण का अभ्यास है। इसके अभ्यास में मनोबल का प्रयोग किया जाता है स्वंय को निर्देश देते हुए कहा जाता है कि हमारे अंग-प्रत्यंग शिथिल हो रहे है और मन की भाग-दौड़ थम रही है। समस्त अच्छी-बुरी वृत्तियाँ नष्ट हो रही है। लगातार अभ्यास से मन प्रशिक्षित हो जाता है और स्वनिर्देशन के अनुरूप कार्य करने लगता है। ऐसा होने पर स्वाभविक गहन निद्रा के परिणाम स्वरूप तनाव दूर हो जाता है।
शिथिलीकरण की विधियाँ-
प. श्रीराम शर्मा आचार्य ने साधना पद्धतियों का ज्ञान विज्ञान नामक वाडमय में शिथिलीकरण की कई प्रभावी विधियाँ बतायी है। वे निम्न है-
1. शिथिलीकरण तनाव से छुटकारा पाने का श्रेष्ठ एवं सरल उपाय है। शवासन इसके लिए सर्वाधिक उपयोगी अभ्यास है। शवासन से तात्पर्य है मुर्दे की तरफ निश्चेष्ट पड़े रहना। यह कुर्सी पर बैठकर या फिर दीवार अथवा अन्य किसी आरामदायक वस्तु का सहारा लेकर भी किया जा सकता है। इसमें शरीर को दबाव मुक्त एवं सुविधा जनक स्थिति में रखा जाता है। इसी अवस्था में गहन भावना की जाती है कि समस्त शरीर का प्राण खिंचकर मस्तिष्क मध्य में केन्द्रित हो गया शरीर के अन्य सभी घटक शान्त एवं मृतप्राय हो गये है।
इस प्रकार के अभ्यास से शरीर के समस्त अंग प्रत्यंग क्रमिक रूप से शिथिल हो जाते है और मन शान्त हो जाता है। दीर्घकाल के अभ्यास के बाद एक ऐसी अवस्था आती है जब अन्तर्जगत में चल रहे संघर्ष का अन्त हो जाता है और इस अवस्था में परमशान्ति मिलती है। परमशान्ति की प्राप्ति ही तनाव से मुक्ति है।
2. शिथिलीकरण के अभ्यास के लिए कोलाहल रहित स्थान पर लेटकर शरीर को भार रहित अनुभव करते हुए कल्पना करना चाहिए कि सम्पूर्ण शरीर रूई जैसा हल्का हो गया है।
इसी दिशा में प्रलयकाल के दृश्य का मानसिक अवलोकन करना चाहिए। सर्वत्र अथाह जल-राशि का भाव चित्र बनाना चाहिए। मन को शान्त करने के लिए कल्पना करनी चाहिए संसार में कोई पदार्थ, व्यक्ति एवं प्राणी में से कुछ भी नहीं है इसके साथ न कोई विचारणा या समस्या ही शेष है। प्रलय की अथाह जल-राशि में हम अकेले है। छोटे बालक के रूप में पत्ते की नौका पर लेटे हुए है और हवा के वेग के साथ मन्द गति से किसी अज्ञात दिशा की ओर प्रवाहित हो रहे है। मार्ग की सारी समस्याओं एवं बाधायें मिट चुकी है।
3. यदि मृत्यु का भय मन से निकल जाये तो मृत्यु की कल्पना एक सुखद अहसास देती है। मृत्यु की कल्पना के अन्तर्गत भाव करना होता है कि शरीर और मन अपनी मौलिक अवस्था में शान्त निःचेष्ट पड़े है। जिसमें से हमारा प्राण निकल चुका है। जीवन भर की थकान मिटाने के लिए दीर्घकाल तक एक ऐसे सुन्दर वातावरण में सोने को मिल गया है जहाँ पर सर्दी, गर्मी, मक्खी, मच्छर, कीट-पंतगों आदि बाधाओं का अवरोध नहीं है। जीवन से जुडे सारे प्रश्न, कर्तव्य, जिम्मेदारियाँ, चिन्ताए एवं समस्यायें मृत शरीर के साथ कोस दूर चली गयी है। हम एक नये सुन्दर एवं सौम्य वातावरण में आ गये है। जो सर्वत्र तनाव मुक्त है। जहाँ पर परम शान्ति एवं सुख व्याप्त है।
यदि प्रतिदिन थोड़े समय के लिए शिथिलीकरण का सम्यक् अभ्यास किया जाये तो शरीर और मन दोनों ही उस प्रक्रिया के अभ्यस्त हो जाते है। जिसके परिणामस्वरूप तनाव एवं थकान को मिटाने वाली नींद अपनी इच्छा से बुलायी जा सकती है। शिथिलीकरण के नियमित अभ्यास से तनाव मुक्ति के साथ-साथ सहज प्रसन्नता भी प्रतिदिन के जीवन में मन में छाई रहती है।
आसन-
शिथिलीकरण के बाद किये गये आसनों का अभ्यास योग के मार्ग में उचित सफलता देता है। स्वास्थ्य की दृष्टि से आसनों का यौगिक चिकित्सा में प्रमुख स्थान है। यदि रोग के अनुरूप आसनों का चुनाव करके सम्यक प्रयोग किया जाये तो योगानुसंधान में उचित सफलता मिलती है। वैकल्पिक चिकित्सा नामक पुस्तक में बताया गया है कि ‘आसन के अभ्यास से शरीर में रक्त का संचार तीव्र गति से होता है और शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य सन्तुलित होते है आसनो का अभ्यास पाचन तंत्र को सबल और पाचन क्रिया को सन्तुलित एवं नियन्त्रित करता है। नाडी सूत्रों और मस्तिष्क से पूरे शरीर का संचालन होता है। इन दोनों को गतिशील बनाए रखने के लिए प्रतिदिन आसनों का अभ्यास करना आवश्यक है।’ सूर्यनमस्कार, जानुशिरासन, सुप्तवज्रासन, सर्वांगासन, मकरासन, पवन मुक्तासन एवं हलासन के नियमित अभ्यास से तनाव से मुक्ति मिलती है।
संवर्धनात्मक आसनों द्वारा शरीर बलिष्ट, सुदृढ़ एवं जीवनी शक्ति से परिपूर्ण हो जाता है। इस प्रकार से विकसित शरीर को ध्यान जैसे उच्च अभ्यासों के दौरान स्थिर एवं आरामदायक स्थिति में रखा जा सकता है। मत्स्येन्द्रासन, धनुरासन, पश्चिमोत्तानासन, मत्स्यासन और गोमुखासन आदि प्रमुख संवर्धनात्मक आसनों के उदाहरण है। शवासन एवं मकरासन का समावेश विश्रान्तिकर आसनों में है। जिनसे पूर्ण शारीरिक शिथिलता तथा मानसिक विश्रान्ति प्राप्त की जा सकती है। पद्मासन, स्वास्तिकासन, सिद्धासन और सुखासन-ध्यानात्मक आसन के अन्तर्गत आते है। इन्हीं आसनों में शरीर को स्थिर रखकर प्राणायाम, धारणा और ध्यान आदि उच्च यौगिक प्रक्रियाओं का अभ्यास किया जाता है। वास्तव में समस्त संवर्धनात्मक आसनों एवं विश्रान्तिकर आसनों के अभ्यास का
ध्येय नात्मक आसन में स्थिरता प्राप्त करना ही है जिसके माध्यम से मन और मस्तिष्क का विकास तथा चेतना को व्यापक विस्तार मिलता है।
आधुनिक समाज की बदलती हुए परिस्थितियाँ मनुष्य को तनाव देने के लिए पर्याप्त है। तनाव से ग्रसित मन सहज ही अशान्त एवं अस्थिर हो जाता है। अशान्त मन को सुख की प्राप्ति नहीं हो सकती। तनावग्रस्त मन शरीर को भी रोगग्रस्त कर देता है। आधुनिक समाज में फैले हुए विविध प्रकार के मनोकायिक रोग इसी प्रकार से उत्पन्न हुए है। मनोकायिक रोग की चिकित्सा में शरीर को दृढ़ एवं सशक्त बनाने के लिए शरीर संवर्धनात्मक आसन को आधार बनाया जाता है। जिसके लिए सूर्य नमस्कार, सिंहासन, वीरासन, धनुरासन, पश्चिमोत्तनासन मत्स्येन्द्रासन, उत्कटासन, शलभासन, मत्स्यासन, कूर्मासन, गरूड़ासन, गोमुखासन और भुजंगासन के दीर्घकालिक अभ्यास के परिणाम से शरीर शरीर के हृदय, फेफड़े आदि प्राणिक अंगों की क्रिया सुचारू हो जाती है। मांसपेशियों की क्रियाविधि संतुलित हो जाती है। शरीर के विविध अंगों में प्राण का सम्यक संचार होने से उनमें सबलता एवं दृढ़ता आती है। ऐसा होने पर रोगी में कुछ कर सकने का भाव जागृत होने से शवासन एवं मकरासन का अभ्यास किया जाता है। स्वामी निरंजनानन्द सरस्वती ने घेरण्ड संहिता में बताया है कि शवासन का अभ्यास सम्पूर्ण मनोकायिक संस्थान को विश्रान्त करता है। इसके द्वारा शरीर और मन के शान्त एवं शिथिल होने से तनावजन्य रोगों से मुक्ति मिलती है। किसी प्रकार की शारीरिक उत्तेजना एवं अन्य आसनों के दौरान होने वाले थकान का अनुभव शवासन के अभ्यास से दूर हो जाता है। विश्रान्त शरीर सजग एवं चैतन्य होता है और सहजता के साथ योग के उच्च अभ्यासों को करने की योग्यता अर्जित कर लेता है। शवासन का दीर्घकालीन अभ्यास मनुष्य में विषम से विषम परिस्थिति में भी तनाव मुक्त रहने की योग्यता विकसित कर देता है।
शवासनं श्रान्तिहरं चित्तविश्रान्तिकारकम् ।। हठप्रदीपिका 1/32।।
विश्रान्त शरीर बहुत सहजता से ध्यानात्मक आसन में स्थिर हो जाता है। ध्यानात्मक आसन के अन्तर्गत पद्मासन के अभ्यास से मेरूदण्ड के निचले भाग में दबाव उत्पन्न होने से तन्त्रिकातन्त्र शिथिल हो जाता है। पेशीय तनाव में कमी आती है जिससे उत्पन्न होने वाली शारीरिक स्थिरता मन को शान्त एवं एकाग्र करती है। महर्षि घेरण्ड के अनुसार पद्मासन का अभ्यास मन को नियन्त्रित कर विचारशून्य बना देता है ध्यानात्मक आसनों का नियमित अभ्यास मन को विकसित एवं समुन्नत करके क्लेशों से मुक्ति दिलाता है। ऐसी अवस्था में सहज ही तनाव से मुक्ति मिल जाती है।
प्राणायाम-
आसनों के स्थिर या सिद्ध हो जाने के पश्चात् किया गया प्राणायाम का अभ्यास विशेष लाभ देता है। ‘आसन प्राणायाम का स्थूलतम रूप है जबकि ध्यान इसका सूक्ष्मतम रूप। जो आसन सिद्ध कर लेता है, वह शनैः शनैः प्राणायाम भी साध लेता है इसी तरह जो ध्यान की साधना करते है, वे प्राणों का नियमन-नियन्त्रण कर लेते हैं। आसन सधते ही प्राणचेतना सधने लगती है, जबकि ध्यान सधते ही वह सिद्ध होने लगती है। इसी कारण से आसन के स्थिर होने पर शरीर सर्दी-गर्मी के और मन सुख-दुःख के द्वंदों की पीडा से मुक्त हो जाता है. जब तक प्राण दो अतियों के बीच पेंडुलम की भाँति डोलता है, सारे द्वंद तभी तक है।’ प्राण के मध्यम धार्ग अपनाने पर सभी द्वंदों की समस्त पीडा मिट जाती है।
प्राण जीवन की शक्ति है. इसके द्वारा जीवन चक्र चलता रहता है। जीवन की समस्त क्रियाएं एवं चेष्टाएं प्राण द्वारा ही क्रियान्वित या संचालित होती है। शरीर में प्राण का असंतुलन मनुष्य में रोगों को जन्म देता है। प्राण के संतुलित रहने पर शरीर की समस्त गतिविधियां सुचारू रूप से सम्पन्न होती रहती है और मानवीय काया स्वस्थ रहती है।
योग दर्शन में प्राणायाम के दो प्रमुख परिणामों को दर्शाते हुए कहा गया है-
1. प्राणायाम के अभ्यास से अज्ञान मिटता है।
अर्थात् अज्ञान तमच्छादित आवरण के रूप में मानव के भीतर के प्रकाश को ढके रहता है। कर्म, संस्कार और पंचक्लेश (अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश) ही मूलतः अज्ञान रूपी आवरण है। प्राणायाम के अभ्यास से शनैः शनैः यह आवरण क्रमिक रूप से क्षीण होता जाता है। फलस्वरूप योगाभ्यासी का अन्तःकरण सर्वथा प्रकाशित हो जाता है।
2. अज्ञान रूपी आवरण के क्षीण होने पर प्राणायाम अभ्यासी के मन में धारणाओ की योग्यता हो जाती है।
अर्थात् निर्मल मन में धारणा की योग्यता विकसित होने पर उसे जिस स्थान पर चाहे सहजता से स्थिर किया जा सकता है। प्राणायाम का नियमित अभ्यास करने से मन और इन्द्रियाँ शुद्ध हो जाते है तथा इन्द्रियों और मन से सम्बन्धित रोग नष्ट हो जाते है। तनाव के दौरान मन अस्थिर एवं अशान्त हो जाता है। तनाव प्रबन्धन के लिए नाड़ीशोधन, शीतली, शीतकारी और भ्रामरी प्राणायाम अत्यन्त लाभकारी है।
‘प्राणायाम का अभ्यास मन को स्थिरता प्रदान करता है।’
स्थिर मन शान्त एवं रोग मुक्त होता है। शान्त मन तनाव से भी सर्वथा मुक्त रहता है। नाड़ीशोधन, शीतली, शीतकारी और भ्रामरी प्राणायाम मन की स्थिरता एवं शान्ति को प्रेरित करते है। इसके अभ्यास से प्राण के प्रवाह में आने वाले अवरोध मिट जाते है। मस्तिष्क की नाड़ियों के शुद्ध हो जाने से मस्तिष्क में स्थित केन्द्रों की कार्यक्षमता बढ़ जाती है। महर्षि घेरण्ड इस बात की पुष्टि करते हुए कहते है कि नाड़ी शुद्धि से नाड़ियों के अवरोध दूर होते है। रक्त संचार सुचारू रूप से होने से मस्तिष्क को पर्याप्त मात्रा में रक्त पहुँचता है तथा तनाव दूर होता है। शीतली, शीतकारी एवं भ्रामरी प्राणायाम मानसिक एवं भावनात्मक उत्तेजनाओं कों शांत करता है। इन प्राणायामों का सामान्यतः मस्तिष्क पर विश्रान्तिदायक प्रभाव होने के कारण तनाव मिट जाता है।
षटकर्म-
षटकर्म शरीर के शोधन के साथ-साथ मन को विकासोन्मुख करने की यौगिक प्रक्रिया है। इसके अर्न्तगत आने वाली नेति, त्राटक तनाव को दूर करने में सहायक हैं। नेति क्रिया मस्तिष्क को शान्त करती है, जिसके माध्यम से मस्तिष्कीय उत्तेजना एवं गर्मी का शमन होता है और परिणामस्वरूप तनाव दूर होता है। त्राटक से आत्मबल में वृद्धि होती है। विचार एवं भावों के शुद्धिकरण से तनाव मिटता है।
ध्यान
ध्यान एक उच्च स्तरीय यौगिक अभ्यास है। प्राणायाम के अभ्यास से शुद्ध हुआ मन धारणा करने के योग्य बन जाता है। अन्तर्जगत या बहिर्जगत के किसी भी विषय को धारणा का विषय बनाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त ध्यान का विषय निर्गुण या सगुण परमात्मा भी हो सकता है। प्रगाढ़ धारणा ही ध्यान का रूप धारण करती है। ध्यान के अभ्यास की बहुत सी विधियाँ प्रसिद्ध है। मन पर विश्रान्तिकारक प्रभाव डालने वाली ध्यान की विधियाँ तनाव को दूर करती है। तनाव के कम होने के साथ व्यक्ति की कार्यक्षमता एवं कार्यकुशलता में वृद्धि होती है। ध्यानात्मक द्वारा तनाव की कमी होने पर सहिष्णुता एवं सौहार्द की भावना में भी वृद्धि होती है। ध्यानात्मक आसन में बैठकर अपने इष्ट-आराध्य का चिन्तन मन में ऐसी विश्रान्ति उत्पन्न करता है जिसके द्वारा तनाव की चिकित्सा हो जाती है। मंत्र जप और स्वाध्याय की प्रक्रिया मनुष्य के अन्तरंग को पवित्र बनाती है। शुद्ध मन मानसिक तनाव से मुक्त होता है।
तनाव प्रबन्धन के लिए प्राकृतिक चिकित्सा
प्राकृतिक चिकित्सा में मिट्टी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश तत्वों का विधिवत् प्रयोग किया जाता है। इन पंचतत्वों में भौतिक गुणों के साथ कई दिव्य गुण भी पाये जाते है जिसका लाभ तनाव के रोगी को मिलता है। मिट्टी की दिव्यता मल को भी खाद में रूपान्तरित करके उपयोगी बना देती है। जल की तरलता व्यक्ति और वस्तु को धुलकर पवित्र बनाती है। अग्नि की तेजस्विता भीतर और बाहर के समस्त दोषों को नष्ट करती है। वायु का शीतल प्रवाह तन और मन को आनन्दित एवं आह्लादित करके प्राण का संचार करता है। आकाश तत्व का महत्व इन सबसे बढ़कर है। प्रकृति के पंचतत्वों में मूलतत्व आकाश है। आकाश तत्व अन्य तत्वों को नियमित एवं नियन्त्रित करता है। आकाश तत्व की साधना से उत्पन्न शब्दों के स्पन्दन तन और मन को विश्रान्ति देते है, जिससे तनाव को उत्पन्न करने वाले शारीरिक और मानसिक कारण दूर होते है। प्राकृतिक चिकित्सा में प्रकृति के पाँच तत्वों के गुणों और शक्तियों का उपयोग तनाव की चिकित्सा में किया जाता है।
प्रकृति के साथ निकटता स्थापित करने के लिए तनाव के रोगी को प्रातःकाल या सायं काल टहलने की आदत डालनी चाहिए। ऐसा करने पर मस्तिष्क को शान्त करने वाली तंत्रिका कोशिकाए क्रियाशील हो उठती है। शरीर के प्रत्येक अंगों एवं कोशिकाओं में शुद्ध रक्त का संचार होता है।
इस प्रकार से टहलना तनाव मुक्ति के लिए सबसे सरल एवं उपयोगी तरीका है। तनाव की दशा में पानी पीने से शीतलता मिलती है और तनाव दूर होता है। प्राकृतिक चिकित्सा के माध्यम से पेट की पट्टी, कटि स्नान एवं एनिमा के द्वारा मानसिक तनाव के कब्ज एवं अनिद्राजन्य लक्षणों को हटाया जाता है। सोने से पूर्व कमर एवं गर्दन पर गीली पट्टी बाँध लेने से मानसिक तनाव दूर होता है और रोगी को शीघ्र नींद आ जाती है। बिस्तर को गीला होने से बचाने के लिए गीले कपड़े के ऊपर सूखा कपडा लपेट दिया जाता है। सोने से पूर्व नहाने पर भी तनाव दूर होता है और गहरी नीद आती है। रीढ़ स्नान देने से तनाव रोगी को लाभ मिलता है।
मालिश के माध्यम से शरीर की थकान दूर होती है और कोशिकाओं को विश्राम मिलता है. जिससे मन शान्त एवं तनाव दूर होता है। सूर्य प्रकाश तनाव के रोगी के लिए अमृत तुल्य है। सूर्य स्नान से रूधिर संचार में तीव्रता आती है। सूर्य स्नान श्वसन क्रिया को गहरी एवं धीमी करता है, रक्त में पोषक तत्वों की आपूर्ति को बढ़ाता है। जिससे रोगी में शक्ति का अहसास होता है और तनाव दूर होता है।
इस प्रकार कुशल मार्गदर्शन में दी गयी प्राकृतिक चिकित्सा द्वारा तनाव के रोगी को आशातीत लाभ मिलता है।
तनाव प्रबन्धन में उपयोगी आहार चिकित्सा
आधुनिक परिवेश की अधिकांश समस्यायें तनाव से जन्म पाती है। तनाव मन की द्वन्दात्मक स्थिति है। तनाव ग्रसित मन की प्रवृति रजोगुण और तमोगुण की ओर होती है। ऐसी दशा में व्यक्ति का रूझान फास्टफूड की ओर होता है। शाकाहारी और मांसाहारी दोनों प्रकार के फास्टफूड प्रचलन में है। फास्टफूड को स्वादिष्ट बनाने के लिए ब्रेड, सैंडविच, पराठा, केक आदि शुद्ध शाकाहारी माने जाने वाले भोज्य पदार्थों में अड़ें की मिलावट सामान्य बात हो गयी है। बोतल बंद ठंडें पेय पदार्थ पीना समान्य बात हो गयी है।
राजसिक और तामसिक श्रेणी के खाद्य पदार्थों की लिप्सा स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर डालती है। दोषपूर्ण आहार का अन्धाधुंध सेवन व्यक्तिगत ही नहीं, समाज की समस्या बन गया है। इन भोज्य पदार्थों ने स्वास्थ्य के लिए संकट खड़ा करके जीवन को संकट ग्रस्त बना दिया है।
आहार से ही शरीर और मन का निर्माण होता है। आहार जीवन पर्यन्त व्यक्ति के विकास पथ को प्रशस्त करने में अपनी अहम भूमिका अदा करता है इसलिए मनुष्य को समुचित मात्रा में उपयोगी आहार का ही सेवन करना चाहिये। मिर्च-मसाले युक्त, तले-मुने एवं डिब्बाबंद खाद्य पदार्थ में प्राण ऊर्जा और जीवनी शक्ति का पर्याप्त अभाव होता है। जायकेदार और जीवनी शक्ति से रहित होने पर भूख से अधिक खाने की प्रवृत्ति को उत्पन्न करने के कारण इनके दोहरे नुकसान है। एक तो प्राण ऊर्जा से रहित होने के कारण ये मनुष्य को भीतर ही भीतर खोखला बना देते है। दूसरे जिह्वा को रुचिकर लगने के कारण भूख से अधिक खा लिए जाते है और विभिन्न प्रकार के रोग को उत्पन्न करते है। रोगों का दबाव मस्तिष्क को भी प्रभावित करता है। मन विचलित होता रहता है। मन की अस्थिर अवस्था उसे किसी काम पर टिकने नहीं देती। ये परिस्थितियों तनाव को उत्पन्न करती है। तनाब की दशा में मन अपनी स्वाभाविक सामर्थ्य को खो बैठता है।
आहार विशेषज्ञों का मानना है कि तनावमुक्त जीवन जीने के लिए व्यक्ति को सादे, सुपाच्य और प्राकृतिक आहार को प्रसन्नतापूर्वक सन्नतापूर्वक खाने की आदत विकसित करनी चाहिए। उदारीकरण एवं ग्लोवलाइजेशन के युग में प्रचलित होती फास्टफूड की पश्चिती सभ्यता को छोड़ना चाहिए। प्राचीन भारतीय संस्कृति की दाल, चावल, रोटी, सब्जी जैसी पुरानी आहार परम्परा को पुनः जीवन का अंग बनाना होगा। प्राकृतिक एवं नैसर्गिक आहार पोषण शक्ति और जीवनी शक्ति से भरपूर होते है। इस दृष्टि से अंकुरित आहार अत्यन्त उपयुक्त है। तनाव की दशा में सेब खाने से लाभ मिलता है। इसके साथ अपने क्षेत्र में उत्पन्न एवं सहजता से उपलब्ध होने वाले ऋतुफल, शाक, टमाटर, गाजर, भिंडी, मूली, खीरा, ककड़ी, लैकी, सेम आदि सब्जियाँ एवं सलाद इस दृष्टि से उपयोगी होते है।
तनाव के निराकरण के लिए स्वास्थ्य के लिए उपयोगी प्राकृतिक एवं संतुलित आहार का सेवन सर्वोतम उपाय है। हरी सब्जियों, तरबूज, खरबूज जैसे मौसमी फलों में सभी पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होते है। ये प्राकृतिक आहार सात्विक, हल्के एवं मानव मन की स्वाभाविक प्रकृति के अनुरूप होते है। आवश्यकता के अनुसार दूध, दही एवं घी का सेवन स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छा होता है। इस प्रकार का आहार ग्रहण करने पर शरीर में रोगों से लडने की अपार क्षमता विकसित हो जाती है। रोगमुक्त शरीर में स्वस्थ्य मन का निवास होता है। उपयोगी प्राकृतिक आहार के सेवन से तनाव रहित स्वच्छ मन का विकास भी होता है इसलिए तनाव से मुक्ति के लिए आहार की महत्ता बताई गयी है।
तनाव प्रबन्धन के लिए उपयुक्त जीवन शैली
सदा जीवन और उच्च विचार के सिद्धांत को अपनाने वाला हल्की-फुल्की जिन्दगी जीने का अभ्यस्त होता है और तनाव जन्य मानसिक विकारों से चिरकाल तक दूर रहते है। ऐसे कई प्रेरक सफल एवं सार्थक उपाय है जिन्हें जीवन-शैली का अंग बनाकर मानसिक तनाव को दूर किया जा सकता है।
1.मनुष्य को अपनी समार्थ्य के अनुरूप ही कार्यों को हाथ में लेना चाहिए।
2. समय की सम्पदा का उपयोग सोच समझकर करना चाहिए।
3. जीवन को रचनात्मक बनाने के लिए अपनी रूचियों का बढ़ाना चाहिए।
4. समधुर संगीत को जीवन-शैली में स्थान देना चाहिए।
5. आशावादी दृष्टिकोण अपनाने से तनाव दूर होता है और कठिन परिस्थितियों मे लक्ष्य की ओर बढ़ना आसान हो जाता है।
6. कार्यों की सूची बनाकर प्राथमिकता के आधार पर व्यवस्थित ढंग से करना चाहिए। बीच-बीच में कार्य को बदल लेना चाहिए या फिर अपनी पसंद के कार्य को लेने से ताजगी का अहसास होता है।
7. डायरी लेखन जीवन-शैली को सुगठित एवं सुव्यवस्थित करने का सरल सर्वोत्तम माध्यम है। जीवन के समस्त छोटे-बड़े कार्यों का लेखा-जोखा जिम्मेदारी मस्तिष्क को सौंपने पर उसका बोझ बढ़ता जाता है। ऐसी दशा मस्तिष्क तनाव एवं थकान ग्रस्त होकर, ठीक से कार्य करने की सामर्थ्य को बैठता है। डायरी लेखन की प्रक्रिया में मस्तिष्क की कार्यों के लेखा-जोखा प्रक्रिया में खर्च होने वाली बहुत सी मानसिक ऊर्जा बच जाती है।
8. प्रतिदिन कुछ समय प्राकृतिक दृश्यों जैसे उगते एवं डूबते हुए सूरज, पक्षियों के कलरव, नदी, वृक्ष, वनस्पतियों, अनन्त आकाश, चन्द्रमा आदि के साथ बिताने मन को प्रसन्नता एवं शांति मिलती हैं।
9. नींद एंव विश्राम के सुनिश्चित निर्धारण से ताजगी आती है। छल कपट से बचते हुए कथनी और करनी के भेद को समाप्त करना चाहिए तथा मन मस्तिष्क निरन्तर निर्मल बनाने के लिए प्रयासरत रहना चाहिए।
10. उच्च भावनाओं तथा दया, करूणा, प्रेम के विकास के लिए स्वाध्याय एवं सत्संग की ओर प्रवृत होना चाहिए।
11. जीवन-शैली में मौन एवं प्रार्थना के समावेश से मन नितान्त तनाव मुक्त एवं शान्त हो जाता है।