
आज नैनो टैक्नोलोजी सम्पूर्ण विश्वभर में प्रचलित हो रही है। तकनीक, सुरक्षा, वाहन, मीडिया, परिवहन एवं स्वास्थ्य क्षेत्र में नैनो टैक्नोलोजी का विश्वभर में तेजी से विकास हो रहा है। नैनो अर्थात सूक्ष्म से सूक्ष्मतम। योग चिकित्सा में प्राणायाम, योगासन भी कोशिकाओं से के सूक्ष्म स्तर पर अर्थात मालिक्यूलर स्तर पर कार्य करता है। इसलिए ये भी नैनो मेडिसिन की तरह कार्य करते है।
आज अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस 21 जून की धूम के बाद ही विश्व भर में योग का प्रचार-प्रसार तीव्रगति से स्वास्थ्य के क्षेत्र में हो रहा है। अतः भारतीय ऋषि परम्परा का योग अन्तर्राष्ट्रीय आकर्षण का विषय बना हुआ है। योग सार्वदैशिक जनकल्याणकारी पद्धति है। आध्यात्मिकता से हटकर केवल योग का स्वास्थ्य की दृष्टि से प्रचलन बढ रहा है। मानसिक तनाव से मुक्ति पाने में शारीरिक सौष्ठव बनाने में तथा कुछ कुछ आध्यात्मिक विकास हेतु योग का स्वास्थ्य की दृष्टि से चिकित्सा में उपयोग हो रहा है।
मानव शरीर जीवन के सभी चारों पुरुषार्थों की प्रप्ति में आरोग्य मय शरीर एकमात्र साधन है। योग चिकित्सा में भारतीय स्वास्थ्य चिन्तकों, मनीषियों ने चारों वेद, संहिताएं, पुराण, उपनिषद, सांख्य दर्शन आदि में सतत स्वास्थ्यानुसंधान करते हुए शरीर के पारस्परिक सम्बंधों के सिद्धान्त प्रतिपादित किये है। आज के वातावरण में स्वास्थ्य भौतिक मानसिक एवं सामाजिक सम्पन्नता का विषय है। शरीर मन एवं आत्मा तीनों पूर्ण रूप से सम्पन्नता का विषय है। शरीर मन एवं आत्मा तीनों पूर्ण रूप से विकार रहित हो तो उसे सम्यक् स्वास्थ्य कहा जाता है।
शरीर को सम्यक् स्वास्थ्य की प्राप्ति एक प्रकार का तप है जो कि तन एवं मन से की जाने वाली साधना है। मन का निग्रह करना, मन को नियंत्रण में रखना स्वाध्याय (आत्मज्ञान) तथा आत्मा को तम के आवरण से रहित करना ईश्वर प्राणिधान है।
क्रिया योग के सतत अभ्यास से शरीर एवं वैराग्य दोनों की प्रवृति होती है, तत्पश्चात मन की शुद्धि पवित्रता प्राप्त होती है एवं धीरे-धीरे मन निर्विकार होकर समाधि की ओर बढता है।
अष्टांग योग के अनुसार अन्तिम स्थिति समाधि की प्राप्ति है, यम एवं नियमों का महाव्रत किया जाता है। जो देश, काल एवं समय की सीमा से परे है। पांच महाव्रतों अहिंसा आदि की, पांच नियमों शौच संतोषादि द्वारा पालन करने से मन शुद्ध एवं पवित्र होता है। साथ ही मन नियंत्रण में आने से चित्त शान्त होता है। चित्त के शान्त होने से सांसारिक वृत्तियां उठना, इच्छाएं जागना, मायाजाल के भंवर में फंसना आदि बन्द हो जाता है। यही योग है “योगस्य चित्त वृत्ति निरोधः”।
योग का इतिहास
मानव के अस्तित्व के साथ ही योग विज्ञान का अस्तित्व प्रारम्भ हो जाता है। हमारी मान्यताओं के अनुसार ज्ञान का प्रारम्भिक स्त्रोत ईश्वर एवं गुरू से उद्गम होता है। ईश्वर अनादि एवं अजन्मा है उसी रूप में योग का प्रवाह भी सृष्टि के आरम्भ काल से प्रवाह मान है।
हठयोग की ज्योत्सना टीका के अनुसार-
योगीश्वर भगवान शिवः- भगवान शिव सृष्टि में योग के उत्पत्तिकर्ता है, उन्होने योग का ज्ञान सर्वप्रथम मात पार्वती को प्रथम शिष्या के रूप में दिया। वही ज्ञान मत्स्येन्द्रनाथ ने सुना, त्तपश्चात उनके शिष्यों ने नाथों की परम्परानुसार संसार में फैलाया।
भगवतगीता के अनुसार- योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार सृष्टि के आरम्भ में मैने सर्वप्रथम योग का उपदेश विवस्वान अर्थात सूर्य को दिया। उन्होने अपने योग का उपदेश विवस्वान अर्थात सूर्य को दिया। उन्होने अपने पुत्र मनु को दिया। मनु ने उनके पुत्र इक्ष्वाकु को, इस प्रकार योग राजाओं में प्रसारित हुआ सभी जगह फैल गया।
याज्ञवल्कय के अनुसार- योग के मूल उपदेशक हिरण्यगर्भ भगवान को मानते है। इनकी अवतार परम्परा में महर्षि पतंजलि को माना जाता है।
श्रुति परम्परा के अनुसार- योग विद्या का उद्भव भगवान शिव द्वारा हुआ। इन्हे आदि गुरु योगी या आदियोगी नाम से जानते है। सर्वप्रथम भगवान शिव ने हजारों साल पहले पूर्व हिमालय में क्रांति सरोवर नामक झील के किनारे योग का गूढ ज्ञान सप्त ऋषियों को दिया था। इन सप्तऋषियों ने यह ज्ञान भ्रमण करे हुए एशिया, मध्.पूर्व, उत्तरी अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका सहित सम्पूर्ण विश्व के भागों में योगविद्या को प्रसारित किया। अगस्त्य मुनि एवं सप्तऋषियों ने योगविद्या को योग संस्कृति के रूप में विश्व में फैलाकर इसे व्यापक रूप दिया।
सिन्धु एवं सरस्वती घाटी सभ्यता में भी 2700 ई.पू. योग का व्यापक स्वरूप प्राप्त होता है। इस सभ्यता में योग के अनेक चित्र, आकृतियां मुहर, जीवाश्म अवशेषों में योग का प्रमाण योग का स्वरूप एवं उसका तत्कालीन उद्देश्य निम्नप्रकार है-
- प्राचीन उपनिषद- 600 ई0पू0 परमात्मा प्राप्ति
- भगवद्गीता – 500 ई0पू0 निष्काम कर्म योग
- पातंजलयोग सूत्र – 300 ई0पू0 चित्तवृत्ति निरोध समाधि प्राप्ति
- हठयोग – 1300 ई0पू0 क्रियायोग से राजयोग
- मध्यकालीन योग – 200-1800 ई0पू0 धार्मिक विचारों की साधना पद्धति
- आधुनिक योग – 1800 ई0पू0 के बाद सामाजिक विकास एवं स्वास्थ्य संरक्षण हेतु
श्री अरविन्दो, स्वामी विवेकानन्द, महर्षि महेश योगी, वी. के. एस. अय्यंगर, जे. कृष्णामूर्ति, आचार्य शिवानन्द
योग की व्युत्पन्नि- संस्कृत शब्द युजिर योगे से शब्द बना है। युज धातु में प्रत्यय लगाने से योग शब्द बना है। पाणिनीय व्याकरण के अनुसार तीन अर्थों में योग का भाव समाहित है।
- युज समाधऔ – समाधि
- युजिर योगे – जोड
- युज संयम के – सांमजस्य
योग की परिभाषा-
- योगः कर्मसु कौशलम् (गीता 2/50)
कार्य में कुशलता का नाम योग है।
- संयोग-वियोग योग संज्ञितम् (गीता 9/23)
जीवात्मा का परमात्मा से मिलने का नाम योग है।
- समत्वं योगमुच्यते (गीता 2/48)
सांसारिक द्वंदों में समभाव रहना ही योग है।
- योगश्चित्तवृत्ति निरोधः (पतंजलि योग सूत्र 1-2)
चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है।
- तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम्।
अप्रमन्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ ।।
कठोपनिषद् 2/3/10-13
अर्थात जब पांचों ज्ञानेन्द्रियों एवं बुद्धि तथा मन स्थिर हो जावें तत्व इस स्थिति को योगी परमगति कहते है। इसके योगी इच्छा रहित हो जाता है।
पातंजल योग दर्शन – इसमें चार पाद जिनके 195 सूत्रों को वर्णन किया है।
- समाधिपाद – 51 सूत्र
- साधनापाद – 55 सूत्र
- विभूतिपाद – 55 सूत्र
- कैवल्यपाद – 34 सूत्र
इसमें अष्टांगयोग, चित्त की वृत्तियां, समाधि, क्रिया योग, पंचक्लेष, दृश्य-दृष्टा, प्रकृति पुरुष, धारणा, ध्यान, समाधि, संयम एवं कैवल्य सिद्धि प्राप्ति का वर्णन है।
योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः –
चित्त – मन, बुद्धि एवं अहंकार
चित्तवृत्तियां – ये पांच होती है।
- प्रमाण – प्रत्यक्ष, अनुमान एवं आप्तोपदेष
- विपर्यय – मिथ्या ज्ञान
- विकल्प – वस्तु के अभाव का ज्ञान
- निद्रा – अभाव जैसा प्रतीत हो
- स्मृति – अनुभव सिद्ध ज्ञान
- अभ्यास एवं वैराग्य के द्वारा चित्तवृत्तियों का निरोध होता है।
- किसी स्थिति का बार-बार यत्न करना अभ्यास है।
- वैराग्यः- दृष्टामुश्रु विकविशयवितृश्णस्य वषीकार संज्ञा वैराग्यम कहलाता है।
देखे व सुने विषयों से चित्त को दूर हटाकर आत्मतत्व में समाहित कर एकाग्र करना वैराग्य कहलाता है।
आज योग चिकित्सा तनाव, अल्सर जैसी समस्याओं में सहायक है, जो समग्र उपचार प्रदान करती है। इसे चिकित्सकीय उपचार के साथ जोड़ने से लाभ बढ़ता है।
आज योग चिकित्सा तनाव, अल्सर जैसी समस्याओं में सहायक है, जो समग्र उपचार प्रदान करती है। इसे चिकित्सकीय उपचार के साथ जोड़ने से लाभ बढ़ता है।🙏🙏